नित्य नये कानून बनने के बावजूद अराजकता, हिंसा, लूट बढ़ती जा रही है, उसका कारण नैतिकता का पाखंड है। कानून के पालन में भेदभाव है, कानून व्यक्ति के व्यक्तित्व को देख कर कार्य करता है।

नित्य नये कानून बनने के बावजूद अराजकता, हिंसा, लूट बढ़ती जा रही है, उसका कारण नैतिकता का पाखंड है। कानून के पालन में भेदभाव है, कानून व्यक्ति के व्यक्तित्व को देख कर कार्य करता है।

सुधीर के बोल :- विधि (या, कानून) किसी नियमसंहिता को कहते हैं।

विधि मनुष्य का आचरण के वे सामान्य नियम होते हैं जो राज्य द्वारा स्वीकृत तथा लागू किये जाते है, जिनका पालन अनिवार्य होता है। पालन न करने पर न्यायपालिका दण्ड देती है। कानूनी प्रणाली कई तरह के अधिकारों और जिम्मेदारियों को विस्तार से बताती है।

विधि शब्द अपने आप में ही विधाता से जुड़ा हुआ शब्द लगता है। आध्यात्मिक जगत में ‘विधि के विधान’ का आशय ‘विधाता द्वारा बनाये हुए कानून’ से है। जीवन एवं मृत्यु विधाता के द्वारा बनाया हुआ कानून है या विधि का ही विधान कह सकते है। सामान्य रूप से विधाता का कानून, प्रकृति का कानून, जीव-जगत का कानून एवं समाज का कानून। राज्य द्वारा निर्मित विधि से आज पूरी दुनिया प्रभावित हो रही है। राजनीति आज समाज का अनिवार्य अंग हो गया है। समाज का प्रत्येक जीव कानूनों द्वारा संचालित है।

नित्य नये कानून बनने के बावजूद अराजकता, हिंसा, लूट बढ़ती जा रही है, उसका कारण नैतिकता का पाखंड है। कानून के पालन में भेदभाव है, कानून व्यक्ति के व्यक्तित्व को देख कर कार्य करता है। इसीलिए भारतीय अपने आप को रसूखदार बनाने के लिये कानून को खरीद कर कानून पर राज करते है।

कानून संसद बनाती है, कार्यपालिका लागू कराती है, न्यायपालिका उलंघन पर दंड देती है परंतु इन तीनों संस्था स्वयं कितनी पवित्र है? यह सरकार को शोध कर आंकड़े प्रस्तुत करने चाहिये तद्पश्चात नागरिकों पर कानून का कड़ाई से पालन करने पर सोचना चाहिये।

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