देश में अर्थव्यवस्था के जो संकेत मिल रहे है वह घोर मंदी के है।

 

देश में अर्थव्यवस्था के जो संकेत मिल रहे है वह घोर मंदी के है।

सम्पादकीय:- सुधीर शुक्ला

सरकार चिंतित है पर अभी भी वह मंदी से निबटने के जो प्रयोग कर रही है उनकी दशा व दिशा समुचित नहीं है।

आप समझ सकते है विकास दर जो 5 प्रतिशत बताई जा रही है वह आंकड़े संगठित व कॉर्पोरेट सेक्टरों के है परन्तु जो अंसगठित क्षेत्र जो हमारी अर्थव्यवस्था का मूल है उसका कोई लेखा जोखा सरकार के पास नहीं है वहाँ हालात भयाभव है।

आगरा के जूता कारोबार हो या लुधियाना का साईकल उधोग का अंसगठित क्षेत्र बिखर चुका है।

हमारे देश में 90 प्रतिशत रोज़गार अंसगठित क्षेत्र से आता है।

जब अंसगठित क्षेत्र में बेरोजगारी से वस्तुओं की मांग घटती है तो उसका सीधा असर संगठित क्षेत्रों पर पड़ता है, अभी हाल ही में आपने पारले जी की खबर सुनी होगी यह दर्शाता है की देश में अंसगठित क्षेत्रों में बेरोजगारी के चलते संगठित क्षेत्रों में उत्पादन की मांग घट रही है फलस्वरूप विकास दर 5 पर आ गयी।

स्वस्थ अर्थव्यवस्था के चक्कर में सरकार ने पहले नोटबंधि फिर 8 माह में जी एस टी जैसे फैसलों के बाद बैंकों का बड़ी तादात में एन पी ए अर्थव्यवस्था को बर्बादी की दिशा में अग्रसर कर दिया।

अब अर्थव्यवस्था ऐसे जाल में फंस गई है कि जिसे पटरी पर लाने के लिये नागरिकों को पिसना होगा क्योंकि सरकार न तो अपने खर्चे घटाएगी न भृष्टआचार पर लगाम लगेगी।

राज्य सरकारों में व्याप्त भृष्टआचार से काले धन को पुनः तेज़ी से उतपन्न हो रहा है आज भी कोई विभाग भृष्टआचार से मुक्त होने का दावा नहीं कर सकता,

समय रहते काले धन को अर्थव्यवस्था की धारा में लाना ही मंदी से उबरने का सुगम उपाय है। आजतक देश में उच्च अधिकारियों पर जो भृष्टता के माध्यम बने हुए है उन पर बहुआयामी कार्यवाही नहीं हुई केवल प्रतीक के तौर पर विपक्षियों के कृपापात्र इक्का दुक्का अधिकारियों पर कार्यवाही कर सरकारें अपने पक्ष में कार्य करने का दबाब बनाती रही है।

देश की अर्थव्यवस्था सबसे महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले मध्यम व निम्न व्यापारियों पर सरकारों का बेहरहमी से चाबुक अधिकारियों के माध्यम से चलता रहा है और बदस्तूर चालू है।

इस तथ्य पर गौर करना आवश्यक है कि अर्थव्यवस्था पिछली सरकारों ने दूषित कर दी थी, उसको स्वस्थ करने के चक्कर में मोदी सरकार ने दवा की हाई डोज़ के चलते अर्थव्यवस्था मरणासन्न की स्थिति में आ गयी, जिसका भुगतान निरीह जनता को ही करना होगा।

एक कहावत है चाकू खरबूजे पर गिरे या खरबूजा चाकू पर कटना तो खरबूजे को ही है।

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