आज देश या प्रदेश में कितनी ही बड़ी कोई घटना हो जाती है,  सड़कों पर सारे विपक्ष नदारत रहते है। कोई जनता के दर्द दुःख को समझने बाँटने जमीन पर नज़र नहीं आता।

आज देश या प्रदेश में कितनी ही बड़ी कोई घटना हो जाती है,  सड़कों पर सारे विपक्ष नदारत रहते है। कोई जनता के दर्द दुःख को समझने बाँटने जमीन पर नज़र नहीं आता।

सुधीर के बोल : भारत में कार्यकर्ता आधारित पार्टियों का संकट है। भाजपा के भी कार्यकर्ता भाजपा के नही उनके मूल संगठन आर एस एस सहित तमाम अन्य संगठनों का गड़जोड है।

23 जून रविवार को उत्तर प्रदेश की एक पार्टी और भाई भतीजावाद को समर्पित हो गयी। कांशीराम स्थापित बसपा में उन्होंने अपने परिवार को कभी आश्रय न देकर जाटव समाज की एक साधारण महिला को पार्टी सर्वोच्च बनाया, दलित समाज के उत्थान के लिये।  पर हुआ एकदम उलट , उस महिला ने दलित समाज के उत्थान की कीमत पर अपना परिवार का उत्थान किया।

लोकतंत्र यही पर आकर हार जाता है।

आज दलित समाज अपने को ठगा सा महसूस कर रहा है। यही घटना सपा में घटी थी जब OBC समाज के प्रतिनिधित्व करने वाले मुलायम सिंह यादव ने भाई भतीजावाद के तहत सैकड़ो की तादात में उच्च पदों पर परिवार व रिश्तेदार को बढ़ाया।

अंधा बाटे रेवड़ी,
फिर-2 अपनेन को दें।

बसपा के पास परिवारिक दायरा कम होने के कारण टिकट की सेल लगती रही है। फार्मूला रहता है- जात पात पूछे नही कोई , हरि नीली दे टिकट उसी की होई।

आज देश या प्रदेश में कितनी ही बड़ी कोई घटना हो जाती है,  सड़कों पर सारे विपक्ष नदारत रहते है। कोई जनता के दर्द दुःख को समझने बाँटने जमीन पर नज़र नहीं आता। सारा जोर शोशल मीडिया पर है। वोट भी सोशल मीडिया पर ले लिया करते है वास्तिवकता में वोट मिलते ही नही। वास्तिवकता यह है कि सारी पार्टियों में फर्जी नेताओं की भरमार है वो जनता के लिये नही जनता उनके लिये है भाव लेकर पार्टियों में पद लेकर उसका उपयोग करने की जुगत में रहते है।

आज देश में अनेकों समस्या सिर उठा रही है पर उनको धरातल पर विरोध करने वाले नही है।

ऐसी कारण सपा बसपा व अन्य का वोट बैंक खिसक गया है।

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