न्यायिक सुधारों पर बात होती है तो वह सिर्फ न्यायाधीशों और न्यायालयों की कार्यप्रणाली तक सीमित रहती है. वकील, जो न्याय व्यवस्था का सबसे बड़ा अंग हैं इस बहस से अक्सर अछूते रह जाते हैं।

न्यायिक सुधारों पर बात होती है तो वह सिर्फ न्यायाधीशों और न्यायालयों की कार्यप्रणाली तक सीमित रहती है. वकील, जो न्याय व्यवस्था का सबसे बड़ा अंग हैं इस बहस से अक्सर अछूते रह जाते हैं।

सुधीर के बोल :- न्यायिक सुधार (Judicial reform) भारत मे बहुत आवश्यक है, भारत में न्याय के नाम अन्याय हो रहा है, न्यायालय आज न्याय का केंद्र नही रह गए है व्यापार का केंद्र है। न्याय व्यवस्था में सुधार की आवश्यकता है सुधार से आशय किसी देश की न्यायपालिका का राजनीतिक ढंग से पूर्णतः या आंशिक परिवर्तन करना है। न्यायिक सुधार, विधिक सुधार का एक हिस्सा है। विधिक सुधार में न्यायिक सुधार के साथ-साथ कानूनी ढांचे में परिवर्तन, कानूनों में सुधार, कानूनी शिक्षा में सुधार, जनता में विधिक जागरूकता लाना, न्याय का त्वरित एवं सस्ता बनाना आदि भी शामिल हैं।

न्यायिक संस्था और विधि का शासन आधुनिक सभ्यता और लोकतांत्रिक शासन की आवश्यकता भी है।

भारत में कानून का स्रोत संविधान है, जो इसके बदले में राज्य को विधिक मान्यता देता है।

न्यायिक सुधारों पर बात होती है तो वह सिर्फ न्यायाधीशों और न्यायालयों की कार्यप्रणाली तक सीमित रहती है. वकील, जो न्याय व्यवस्था का सबसे बड़ा अंग हैं इस बहस से अक्सर अछूते रह जाते हैं।

आज न्याय व्यवस्था अप्रभावी होने के कारण ही देश में लूट, बलात्कार, घोटाले, रिश्वत, भरस्टाचार आदि से देश में आम आदमी का जीवन दूभर कर दिया है नैतिकता केवल किताबी बात रह गयी है।

जिस प्रकार RTI का जबाब देने की समय सीमा निर्धारित है उसी प्रकार प्रत्येक अपराध के निर्णय की समय सीमा निर्धारित की जाए। समय से निर्णय न होने पर जिस व्यक्ति के कारण देर हो उस पर आर्थिक दंड का प्रावधान अनिवार्य हो, ऐसा होने से न्याय में तत्परता आएगी।

जब देश की जनता अपने खून पसीने की महंगी मज़दूरी से टैक्स देकर न्यायालय के भवन से लेकर न्यायालय के कर्मचारियों का वेतन तक देते है फिर उनसे केस के लिये अतिरिक्त धन क्यों लिया जाता है? क्या यह भरस्टाचार नहीं है?

किसी भी केस का सारा खर्चा सरकारी तौर पर होना चाहिये जिस अधिवक्ता को आप चुनते उसका भुगतान व अन्य खर्चे का एक पूर्व निर्धारित मूल्य अनुसार सरकार को देना चाहिये।

स्वस्थ लोकतंत्र बिना सही न्याय के अलोकतंत्र है।

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