इस तरह के भवनों को जो मंदिरनुमा बने है ,मंदिर कम व्यापर के केँद्र ज्यादा लगते है। जहाँ पर संवेदनहीनता हो वह धर्म के केंद्र कैसे हो सकते है?

इस तरह के भवनों को जो मंदिरनुमा बने है मंदिर कम व्यापर के केँद्र ज्यादा लगते है। जहाँ पर संवेदनहीनता हो वह धर्म के केंद्र कैसे हो सकते है?

सुधीर के बोल :- वृन्दावन को मंदिरों का नगर कहें तो अतिश्योक्ति नहीं होगी। यहाँ के नागरिकों का संपूर्ण जीवन प्रत्यक्ष अप्रत्यक्ष रूप से मंदिर देवालयों से जुड़ा हुआ है यहाँ तक की राजनैतिक व्यक्तियो की राजनीति मंदिर और प्रसाद के माध्यम से चलती है। परंतु इस धाम का सकारात्मक पहलू होने के बाद भी मंदिर देवालयों की प्रबंधक समिति की संकीर्ण सोच के चलते अनेक दुश्वारियां जनता को भोगनी पड़ती है, जब आप मंदिर सजाकर जनता को आमंत्रित करते है उनके आने में कोई असुविधा न हो उसका प्रबंधन भी नहीं करते है विशेषकर जब आप धार्मिक होने का दावा करते हो।

आज वृन्दावन की यातायात समस्या बताती है कि ये नाकामी मंदिर प्रबंधन, प्रशासन, शासन की मिलीभगत के कारण है। अगर 100 – 200 साल पुराने मंदिर देवालयों को छोड़ दे (जब इतना यातायात नहीं था) तो नित्य नए मंदिर , आश्रमो को ये खुली छूट क्यों है कि वे बिना पार्किंग व् आवश्यक सुविधा के बिना एकड़ो में निर्माण कर जहाँ हज़ारो सैकड़ो की संख्या में गाड़ियां आएंगी उनको सड़कों के हवाले छोड़ दो, और पूरे वृन्दावन को अस्त व्यस्त कर दो, ये कैसी धार्मिकता, व्यवस्था इस गठजोड़ ने बना रखी है,

क्या असहाय, बीमार, बड़े बूड़ो, स्कूली बच्चो के खिलाफ क्राइम नहीं है?

संगठीत होकर, धर्म का चोला पहनकर, मंत्री, अधीकारियो की वंदना कर उपरोक्त कृत्य को उचित नहीं ठहरा सकते, मंदिरों और आश्रमो के पास दुकान, पोस्ट ऑफिस व् बैंक, व्यापार आदि के लिए धनपार्जन वास्ते स्थान आसानी से उपलब्ध है, परन्तु भक्तो की कीमत पर।
इस तरह के भवनों को जो मंदिरनुमा बने है मंदिर कम व्यापर के केँद्र ज्यादा लगते है।
जहाँ पर संवेदनहीनता हो वह धर्म के केंद्र कैसे हो सकते है?

इसके लिए सभी मंदिरों के प्रबंधन को आपस में समिति बनाकर वृन्दावन को सुन्दर व्यवस्थित करने की दिशा में पहल करनी चाहिए।

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